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विजयादशमी के दिन ब्राह्मण सरस्वती पूजन और क्षत्रिय शस्त्र पूजन करते हैं।

प्रकाशनार्थ

विजयादशमी के दिन ब्राह्मण सरस्वती पूजन और क्षत्रिय शस्त्र पूजन करते हैं।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ही भारतीय संस्कृति की असली पहचान है।

दिनेश तिवारी
दशहरा का पर्व देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है, दशहरा को विजयादशमी व कई जगहों पर आयुधपूजा या शस्त्र पूजा के नाम से भी जाना जाता है। जैसे तमिलनाडु,तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में इसे आयुध पुजाई के नाम से अस्त्र-शस्त्र का पूजन किया जाता है। इसके अलावा केरल,उड़ीसा,कर्नाटक राज्यों में मनाया जाता है। महाराष्ट्र में आयुध पूजा को खंडे नवमी के रूप में मनाया जाता है। यूपी,बिहार अन्य जगहों पर शस्त्र पूजन के रूप में जाना जाता है। हर कोई इस पर्व का इंतजार बेसब्री से करता है, हर बार यह पर्व अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। आज हम आपसे इस दौरान होने वाले विशेष रूप से होने वाली शस्त्र पूजा की बात करेंगे। शस्त्र पूजा नवरात्रि का एक अभिन्न अंग माना जाता है, इस दिन सभी अस्त्र-शस्त्र की पूजा करने की परंपरा है। भारत में नवरात्रि के अंतिम दिन अस्त्र पूजन की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
विजयादशमी को क्यों किया जाता है शस्त्र पूजन ?
ये तो आप सभी जान गए कि विजय के प्रतीक दशहरा वाले दिन हर तरफ अस्त्र-शस्त्र की पूजा करने की परंपरा है। कहा जाता है कि इस दिन जो भी काम किया जाता है उसका शुभ फल अवश्य प्राप्त होता है। इतना ही नहीं ये भी माना गया है कि शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए इस दिन शस्त्र पूजा अवश्य की जानी चाहिए। दशहरा क्षत्रियों का बहुत बड़ा पर्व है। इस दिन ब्राह्मण सरस्वती पूजन और क्षत्रिय शस्त्र पूजन करते हैं।

शस्त्र व शास्त्र दोनों की होती है पूजा
अब बात करते हैं शस्त्र पूजन के महत्व की तो बता दें कि दशहरे के दिन क्षत्रिय शस्त्र पूजन करते हैं जबकि इस दिन ब्राह्मण शास्त्रों का पूजन करता है। वहीं ये भी बता दें कि जो लोग व्यापारी हैं वो अपने प्रतिष्ठान आदि का पूजन करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि कहा जाता है कि इस दिन जो भी काम किया जाता है, उसमें जीवनभर निराशा नहीं मिलती यानी वह काम हमेशा ही शुभ फल देता है। शस्त्र पूजन की परंपरा प्राचीनकाल से चली आ रही है, शास्त्र की रक्षा और आत्मरक्षा के लिए धर्मसम्म्त तरीके से शस्त्र का प्रयोग होता रहा है। प्राचीन समय में क्षत्रिय युद्ध पर जाने के लिए इस दिन का ही चुनाव करते थे। उनका मानना था कि दशहरा पर शुरू किए गए युद्ध में विजय निश्चित होगी। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर विजयादशमी के दिन शस्त्र पूजन की सही विधि आखिर क्या होती है ? तो बताते चलें कि इसके लिए सबसे पहले घर पर जितने भी शस्त्र हैं, उन पर पवित्र गंगाजल का छिड़काव करें। शस्त्रों को पवित्र करने के बाद उन पर हल्दी या कुमकुम से टीका लगाएं और फल-फूल अर्पित करें। वहीं एक बात का ध्यान अवश्य रखें कि शस्त्र पूजा में शमी के पत्ते जरूर चढ़ाएं। दशहरे पर शमी के पेड़ की पूजा करने का विशेष महत्व होता है।

विजयादशमी पर शस्त्र पूजन का धार्मिक महत्व ,संघ क्यों करता है शस्त्र पूजन
भारत में आश्विन मास की नवमी अर्थात नवरात्रि समाप्त होने के बाद विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है। दरअसल यह पर्व भगवान श्री राम की लंकापित रावण पर जीत का उत्सव है तो दूसरी ओर यह हमारी ऐतिहासिक परंपराओं के निर्वहन का त्यौहार भी है।हर साल विजयादशमी का पर्व बड़ी धूमधाम से बनाया जाता है इस दिन शस्त्र पूजन का विधान है ये प्रथा कोई आज की नहीं है बल्कि सनातन धर्म से ही इस परंपरा का पालन किया जाता है।इस दिन शस्त्रों के पूजन का खास विधान है। ऐसा माना जाता है कि क्षत्रिय इस दिन शस्त्र पूजन करते हैं जबकि ब्राह्मण इस दिन खासतौर से शास्त्रों का पूजन करते हैं।विजयादशमी पर्व यानि बुराई पर अच्छाई की जीत का त्यौहार,अधर्म पर धर्म की जीत का त्यौहार, इस बार ये पर्व 25 अक्टूबर को मनाया गया।इस त्यौहार पर शस्त्र पूजा का खास विधान है यहां तक कि हमारी सेना में विजयादशमी के पर्व पर शस्त्र पूजन किया जाता है।विजयादशमी के दिन जो भी कार्य शुरु किया जाए उसमें सफलता निश्चित रूप से मिलती है। आज भी शस्त्र पूजन की ये परंपरा प्राचीन काल से जारी है उस वक्त भी योद्धा युद्ध पर जाने के लिए दशहरे के दिन का चयन करते थे।इस दिन पूजन कार्य करते है 9 दिनों की शक्ति उपासना के बाद 10 वें दिन जीवन के हर क्षेत्र में विजय की कामना के साथ चंद्रिका का स्मरण करते हुए शस्त्रों का पूजन किया जाता है विजयादशमी के शुभ अवसर पर शक्तिरूपा दुर्गा, काली की आराधना के साथ-साथ शस्त्र पूजा की परंपरा सदियों से चली आ रही है। पुलिस विभाग द्वारा भी अपने शस्त्रों का पूजन किया जाता है तो दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी शस्त्र पूजन करता है। हमारे देश में विजयादशमी के शुभ अवसर पर देवी पूजा के साथ-साथ शस्त्र पूजा की परंपरा भी कायम हैं। यह शस्त्र पूजा दशहरा के दिन ही क्यों की जाती है, इस संबंध में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार राम ने रावण पर विजय प्राप्त करने हेतु नवरात्र व्रत किया था, ताकि उनमें शक्ति की देवी दुर्गा जैसी शक्ति आ जाए अथवा दुर्गा उनकी विजय में सहायक बनें। चूँकि दुर्गा शक्ति की देवी हैं और शक्ति प्राप्त करने हेतु शस्त्र भी आवश्यक है, श्रीराम ने दुर्गा सहित शस्त्र पूजा कर शक्ति संपन्न होकर दशहरे के दिन ही रावण पर विजय प्राप्त की थी। तभी से नवरात्र में शक्ति एवं शस्त्र पूजा की परंपरा कायम हो गई।  ऐसी मान्यता है कि इंद्र भगवान ने दशहरे के दिन ही असुरों पर विजय प्राप्त की थी। महाभारत का युद्ध भी इसी दिन प्रारंभ हुआ था तथा पांडव अपने अज्ञातवास के पश्चात इसी दिन पांचाल आए थे, वहाँ पर अर्जुन ने धनुर्विद्या की निपुणता के आधार पर,द्रौपदी को स्वयंवर में जीता था। ये सभी घटनाएँ शस्त्र पूजा की परंपरा से जुड़ी हैं।राजा विक्रमादित्य ने दशहरा के दिन ही देवी हरसिद्धि की आराधना,पूजा की थी। छत्रपति शिवाजी ने भी इसी दिन देवी दुर्गा को प्रसन्न करके तलवार प्राप्त की थी, ऐसी मान्यता है। तभी से मराठा अपने शत्रु पर आक्रमण की शुरुआत दशहरे से ही करते थे। महाराष्ट्र में शस्त्र पूजा आज भी अत्यंत धूमधाम से होती हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना 1925 में विजयादशमी यानी दशहरा के दिन हुई थी।संघ की स्थापना 27 सितंबर 1925 में डॉ. केशव हेडगेवार जी द्वारा की गयी थी। हेडगेवार जी ने अपने घर पर ही कुछ लोगों के साथ गोष्ठी में संघ के गठन की योजना बनाई थी। दशमी पर शस्त्र पूजन का विधान है। इस दौरान संघ के सदस्य हवन में आहुति देकर विधि-विधान से शस्त्रों का पूजन करते हैं। संघ के स्थापना दिवस कार्यक्रम में हर साल शस्त्र पूजन खास रहता है।संघ की तरफ शस्त्र पूजन हर साल पूरे विधि विधान से किया जाता है। इस दौरान शस्त्र धारण करना क्यों जरूरी है, की महत्ता से रूबरू कराते हैं, बताते हैं, राक्षसी प्रवृति के लोगों के नाश के लिए शस्त्र धारण जरूरी है। सनातन धर्म के देवी-देवताओं की तरफ से धारण किए गए शस्त्रों का जिक्र करते हुए एकता के साथ ही अस्त्र-शस्त्र धारण करने की हिदायत दी जाती है, शस्त्र पूजन में भगवान के चित्रों से सामने शस्त्र रखते हैं।दर्शन करने वाले बारी-बारी भगवान के आगे फूल चढ़ाने के साथ शस्त्रों पर भी फूल चढ़ाते हैं।इस दौरान शस्त्रों पर जल छिड़क पवित्र किया जाता है। महाकाली स्तोत्र का पाठ कर शस्त्रों पर कुंकुम, हल्दी का तिलक लगाते हैं। फूल चढ़ाकर धूप-दीप और मीठे का भोग लगाया जाता है। विजयादशमी का पर्व जगजननी माता भवानी की दो सखियों के नाम जया-विजया पर मनाया जाता है।यह त्यौहार देश,कानून या अन्य किसी काम में शस्त्रों का इस्तेमाल करने वालों के लिए खास है। शस्त्रों का पूजन इस विश्वास के साथ किया जाता है कि शस्त्र प्राणों की रक्षा करते है। विश्वास है कि शस्त्रों और शास्त्रों में विजया देवी का वास है।इसलिए विजयादशमी के दिन पूजन का महत्व बढ़ जाता।
दिनेश तिवारी
मीडिया प्रभारी

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